अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

प्रेरक विम्बों से अनुप्राणित लेखन!

भले हमारी रचनाओं को पढ़ें बहुत लोग
पर हम लिखते हैं बहुत कम लोगों के लिए
अरे! ऐसे कैसे कोई भी रो देगा...
एक हृदय चाहिए धड़कता हुआ आखों के नम होने के लिए

कुछ एक लोगों की प्रेरणा है
जो मेरी कलम से स्वतः लिख रही है
ऐसा कब होता है कि सच्चाई वही हो...
जो सतह पर दिख रही है

वरना बार बार "न लिखने" की जिद के बावजूद
कैसे कविता बनती...? हमे अब न लिखने की जिद न करनी
वो जो जी रहे हैं कविता को...
उनके हौसले की गाथा ही मेरी कविताओं की जननी

मुझे नहीं किसी प्रशंसा से सरोकार
मुझे छपने की भी कोई ललक नहीं
बस एक बार मुझे पढ़ने वाला मुस्कुरा दे...
फिर हासिल मुझको कौन फ़लक नहीं

मिले अगर ये संतोष परम तो अतिउत्तम
वरना है ही क्या हमारे पास खोने के लिए
अरे! ऐसे कैसे कोई भी रो देगा...
एक हृदय चाहिए धड़कता हुआ आखों के नम होने के लिए

राही प्रीत के...!

कारवां बंजारों का और सफ़र गीत के...
हम मस्ती में चलने वाले... राही प्रीत के...
कविता तो केवल एक बहाना है!
हमें सुधीजनों को एक छत के नीचे लाना है!!

चलने की निष्ठा है... चले दिलों को जीत के...
हम मस्ती में चलने वाले... राही प्रीत के...
ये शब्द तो केवल एक बहाना है!
हमें मौन की महिमा को ही आजीवन गाना है!!

जो औरों के गम से रोता हो... हम भक्त हैं उस रीत के...
हम मस्ती में चलने वाले... राही प्रीत के...
ये साथ तो एक बहाना है!
हमें शाश्वत सत्य तक जाना है!!

कारवां बंजारों का और सफ़र गीत के...
हम मस्ती में चलने वाले... राही प्रीत के...
कविता तो केवल एक बहाना है!
हमें सुधीजनों को एक छत के नीचे लाना है!!

कविता कोश..... एक दुर्लभ कीर्तिमान!

कविता कोश हिंदी काव्य का महासागर है... नूतन-पुरातन काव्यों का असीम भंडार है! इस अद्भुत संग्रह को नाम देते वक्त शायद ही संस्थापक ने सोचा होगा कि जिस स्वप्न को वे कविता कोश का नाम दे रहे हैं... वह आने वाले कुछ-एक वर्षों में ही अपने नाम को सार्थक करता हुआ तीस हज़ार से भी अधिक कविताओं का विशाल कोश बन जायेगा! कविता कोश सामुहिक प्रयास का वह उत्कृष्ट उदाहरण है जिससे संकल्प शक्ति की पुष्टि होती है! अगर दिशा और चाहत है तो कीर्तिमान स्थापित हो ही जाते हैं... कविता कोश जैसे दुर्लभ कीर्तिमान भी! सामाजिक परिवेश में भी हम परिस्थितियों की दुरुहता की बात करते हैं... जीवन की विडम्बनाओं की बात करते हैं..., मगर तब हम शिकायतों के बीच इस तथ्य को भूल जाते हैं कि अन्तःस्थिति के ठीक होने पर परिस्थितियां हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं... कठिन घड़ियाँ आई होंगी कविता कोश की राह में भी... लेकिन अन्तःस्तिथि की दृढ़ता ने बचा लिया होगा हर संकट से... और आज उसका एक अस्तित्व है... सही अर्थों में सागर ही है यह कोश... सारी काव्य नदियों का उद्गम कहीं भी हो... मंजिल तो मानों सबकी एक है- कविता कोश, जहां उन्हें संग्रह का वरदान प्राप्त होगा और कालजयी रचनाएँ सदा के लिए सुरक्षित हो जाएँगी! यह वस्तुतः एक आदमी का सपना रहा होगा... आज आंकड़े बताते हैं कि स्वप्न से वास्तवीकता तक का सफ़र तय हो चला है... अभी बहुत आगे जाना है, मगर आज कुछ पल रुक कर इस उपलब्द्धि पर गर्वान्वित हो लिया जाये... हृदय से उस प्रभु को धन्यवाद दिया जाए जिसने किसी भलेमानुष को इस विराट कार्य हेतु प्रेरित किया... माँ शारदे के मंदिर में भोग लगाया जाये... शब्द ब्रह्म की आराधना की जाये... वस्तुतः सब मिलकर इस ज्ञान यज्ञ में शामील हो कर ज्ञान और काव्य प्रवाह रूपी अमृत तत्व का पान करें!
कविता कोश उस विशाल नीलगगन के सदृश है... जहाँ साहित्य गगन के दैदीप्यमान नक्षत्र शोभा पा रहे हैं... नवोदित सितारे भी जगमगा रहे हैं... हर एक के लिए रौशनी है यहाँ!
इस आसमान के नीचे सभी नए पुराने रिश्ते मुखर हो उठते हैं... बीता स्वर्णयुग इस युग से संवाद करता हुआ सा जान पड़ता है... संवेदनाओं को पर लग जाते हैं...! अपने देश और अपने घर से दूर बैठी इस बेटी को कविता कोश ने इतने सारे भले मित्र दिए... भारत और हिंदी को यहाँ मेरे लिए इतना सुलभ बनाया कि इसकी व्याख्या शायद शब्दों में संभव नहीं! यहाँ तक कि इस काव्य गंगा के संपर्क में आकर ही वर्षों से छुटी हुई मेरी कवितायेँ प्रेरित हो पुनः मुझ तक आ सकीं! यह कविता कोश और उससे जुड़े मूल्यों का ही प्रताप था कि मेरी सृजनशीलता पुनः जागृत सी हो उठी!!!
कविता कोश नित प्रतिदिन हमारे प्रयास से पल्लवित-पुष्पित हो, यह पावन संग्रह उत्तरोत्तर समृद्धि की नयी परिभाषाएं गढ़े... यही शुभकामना है!

दूरी तय की है...
अभी
कई कीर्तिमान और हासिल करने हैं!
निराशा के भंवर में
काव्य की ज्योत जलानी है...
सकल संताप हरने हैं!!

संग्रह की
अद्भुत महिमा का
गान हो!
कविता कोश का अस्तित्व
हमारे लिए
आत्माभिमान हो!!

साहित्य गगन के
दैदीप्यमान नक्षत्रों से
जगमगाता कोश का आकाश!!
हे! सुधिजनो...
आओ जीवन दृष्टि मिलेगी...
यहाँ है कविता का दिव्य प्रकाश!!!

सुबह जरा कुछ पल प्रार्थना के जी लें...!

यह कविता भी आंसुओं के साथ लिखी गयी अभी अभी..... प्रेरणा है कहीं से जो आंसुओं में भी प्रार्थना के फूल और एक भली सी मुस्कान वाली सुन्दर छवि जड़ रही है:
रुदन कभी कभी अदृश्य वेदना से भी अनुप्राणित होता है....अव्याख्येय....ऐसे में कविता आंसू पोछने हेतु रुमाल का काम करती है! कहीं एक पल के लिए भी अगर शब्दों को पढ़ कोई मुस्कुराये तो कविता ने अपना काम कर लिया....

सुबह जरा कुछ पल प्रार्थना के जी लें
सुधापान का अवसर होगा कल जरूर,
आज खुशी-खुशी हलाहल पी लें

इतना विस्तार मिले
धरती छोटी पड़ जाए
कविता हमारी नील गगन की
सीमा तय कर आए!
क्षितिज पर जहाँ
धरती और गगन मिले
वहाँ एक रोज़ मेरी कविता
पूर्ण सौंदर्य के साथ खिले!!

संकुचित मानसिकता से मुक्त है राही अगर,
तो दूर तलक जाता है...
हृदय कैसे-कैसे अद्भुत सफ़र तय कर आता है...
धरा का सारा स्नेह आँचल में समेट जी लें
सुधापान का अवसर होगा कल जरूर,
आज खुशी-खुशी हलाहल पी लें

इतना प्यार मिले
दामन छोटा पड़ जाए
जितना पायें औरों से
उससे कहीं बढ़कर प्यार लुटाए!
हर निर्मल हृदय की
मनोकामनाएं सच हो खिलें
भले कुछ टहनियां टूटें,
पर जड़े कभी न हिलें!!

सुबह जरा कुछ पल प्रार्थना के जी लें
सुधापान का अवसर होगा कल जरूर,
आज खुशी-खुशी हलाहल पी लें

कविता तो मुझसे रूठी है!

कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे अनायास आ गयी मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...कविता तो मुझसे रूठी है!!

चाँद तनहा है गगन में...
साथ की सारी परिकल्पनाएं विदीर्ण...टूटी है!
आज कैसे अनायास आ गयी मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...कविता तो मुझसे रूठी है!!

सुन्दर...निर्मल...ललित ही नहीं यहाँ...
कुछ ऐसे भी सत्य हैं...जिनकी दर्द भरी श्रुति है!
आज कैसे अनायास आ गयी मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...कविता तो मुझसे रूठी है!!

सच के इस काव्य प्रवाह में...
कोई बात नहीं बनावटी, कोई बात नहीं झूठी है!
आज कैसे अनायास आ गयी मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...कविता तो मुझसे रूठी है!!

प्रेरणापुंज हो आप...
इस सत्य में कहीं न कोई त्रुटी है!
आज कैसे अनायास आ गयी मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...कविता तो मुझसे रूठी है!!

चरणधूलि को चन्दन..रोली..तिलक कहा है...
भावों के संसार की अलग अनुभूति है!
आज कैसे अनायास आ गयी मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...कविता तो मुझसे रूठी है!!

आगे को चल दिए...!

एक मित्र ने लम्बे अंतराल के बाद एक कविता लिखी, उसी कविता की प्रेरणा से उसी कविता को समर्पित यह रचना...

पथ के निहारे शूल
और वो चल दिये...
आभार है उस रात्री के अंतिम पहर का
जिसने हमे आने वाले कितने ही कल दिये...

रात्री-वृक्ष ने वेदना के जितने
फूल और फल दिये...
उससे कहीं बढ़कर जीवन को ध्येय दिया
सकल उलझनों के हल दिये...

मन की वीणा को साज दिया जिसने
ये वही प्रभु है, जिसने हमको विस्तृत नभ और थल दिये...
आत्म-मंथन की क्या दिव्य गुंजाईश जन्मी
जो उसने... हमे दिव्य दर्द भरे अनोखे पल दिये...

मन भी भीगा
नयन भी भीगे
विचारों को कैसे-कैसे सींचा,
कैसे जीवन पौध को जल दिए...

ये संग रोने वाला हमसाया ही जान पायेगा
किस संजीवनी से अनुप्राणित हो, वो-
पथ के शूलों को कर अनुकूल...
बिखेर चहुँओर मुस्कराहट आगे को चल दिए...

"स्वप्न से स्मृति तक" की रात से सुबह तक से प्रेरित कविता लिख कर भावों के जुड़ाव के विषय में सोच विस्मित हूँ!
सच ही है....

कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे अनायास आ गयी मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...कविता तो मुझसे रूठी है!!

अनुशील... एक अनुपम यात्रा!

शुरुआत
एक यात्रा की
जहाँ शब्द खिलते हों
भाव की धरती पर
और महक जाता हो अम्बर!

शुरुआत
एक यात्रा की
जहाँ पल भर के लिए भी
एहसास तन्हा न हो
काँटों औ'फूलों से हो सजी डगर!

शुरुआत
एक यात्रा की
जहाँ हों झुके हुए नयन
और प्रार्थनारत हो चेतना
साथ चल रहा हो स्वयं इश्वर!

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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