अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कितना अच्छा हो...!

एक बच्चा
मन के भीतर
जीवनपर्यंत
सजीव रहे
तो
कितना अच्छा हो!

टेढ़े-मेढ़े
रस्तों में
कुछ तो
सदैव
सीधा हो
सच्चा हो!

विरोध पल भर, फिर
दोस्ती की बयार
अहंकार से अछूता
बचपन सा ही हो मन, तो
कितना अच्छा हो!

सभी रिश्ते भी निभा लें और ऐसा भी न हो
कि अपनी आत्मा से ही सम्बन्ध विच्छेद हो जाये
झूठे इस जगत में
कुछ तो शाश्वत हो
सच्चा हो!

एक बच्चा
मन के भीतर
जीवनपर्यंत
सजीव रहे
तो
कितना अच्छा हो!

6 टिप्पणियाँ:

भूतनाथ 13 अगस्त 2010 को 11:47 am  

bahut sacchha....bahut kharaa....bahut pyaraa aur bahut bhaavbheenaa aapne sach.....

anupama 13 अगस्त 2010 को 11:49 am  

dhanyavad

harishjharia 13 अगस्त 2010 को 4:15 pm  

Nishchhal man kii maasoom abhivyakti... ati sundar...

I too wrote on similar lines... Here is the link:
Do we have a child within us?
http://harishjhariasblog.blogspot.com/2009/07/analytical-article-do-we-have-child.html

anupama 13 अगस्त 2010 को 6:46 pm  

thanks harish ji!
will definitely read the link given....
regards,

संगीता स्वरुप ( गीत ) 16 अगस्त 2010 को 11:37 am  

मंगलवार 17 अगस्त को आपकी रचना ( ऐसा हो )... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ....आपका इंतज़ार रहेगा ..आपकी अभिव्यक्ति ही हमारी प्रेरणा है ... आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

anupama 17 अगस्त 2010 को 11:59 am  

@sangeeta ji
charcha padkar bahut accha laga....
kavya motiyon ko pirokar kya mala banayi hai aapne!
really overwhelmed :)

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