अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

ऐसा हो ....! ("एक संकल्प ...एक सोच")

मान-अभिमान
से परे
रूठने-मनाने के
सिलसिले सा
कुछ तो भावुक आकर्षण हो!

किनारे पर रेत से
घर बनाता
और अगले पल उसे तोड़ छोड़
आगे बढ़ता सा
भोला भाला जीवन दर्शन हो !

नमी सुखाती हुई
रुखी हवा के
विरुद्ध
नयनो से बहता
निर्झर हो !

परिस्थितियों की दुहाई न देकर
अन्तःस्तिथि की बात हो
शाश्वत संघर्ष
आत्मशक्ति पर ही
निर्भर हो !

भीतर बाहर
एक से ...
कोई दुराव-छिपाव नहीं
व्यवहारगत सच्चाईयां
मन प्राण का दर्पण हो !

सच के लिए
लड़ाई में
निजी स्वार्थों
के हाथों
कभी न आत्मसमर्पण हो !

18 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) 13 अगस्त 2010 को 10:36 am  

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति ...रचना अच्छी लगी


आप कमेंट्स कि सेटिंग से वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें तो टिप्पणीकर्ता को सरलता होगी

anupama 13 अगस्त 2010 को 11:51 am  

dhanyavad sangeeta ji:)

...will do as suggested!

babanpandey 13 अगस्त 2010 को 5:01 pm  

ruthana -manana ek satat prakriya hai ..thik usi tarah ret par ghar banana aur bigadna ...dono aisthir hai ...aapne bahut kavyatak rup me likha ....thanks for tagg

संगीता स्वरुप ( गीत ) 15 अगस्त 2010 को 3:32 pm  

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें

संगीता स्वरुप ( गीत ) 15 अगस्त 2010 को 3:34 pm  

अभी तक आपने वर्ड वेरिफिकेशन नहीं हटाया है .. :):)

यदि कोई परेशानी हो तो मुझे मेल करें ...

sangeetaswarup@gmail.com

anupama 16 अगस्त 2010 को 8:28 am  

:)

anupama 16 अगस्त 2010 को 8:28 am  

thanks for ur concern, mam!
done the needful!
regards,

संगीता स्वरुप ( गीत ) 16 अगस्त 2010 को 11:37 am  

मंगलवार 17 अगस्त को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ....आपका इंतज़ार रहेगा ..आपकी अभिव्यक्ति ही हमारी प्रेरणा है ... आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) 22 दिसंबर 2011 को 4:18 am  

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल आज 22 -12 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में आज... क्या समझे ? नहीं समझे ? बुद्धू कहीं के ...!!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) 22 दिसंबर 2011 को 7:27 am  

सच के लिए
लड़ाई में
निजी स्वार्थों
के हाथों
कभी न आत्मसमर्पण हो !

बहुत ही अच्छा आह्वान !

सादर

वन्दना 22 दिसंबर 2011 को 7:29 am  

सच के लिए
लड़ाई में
निजी स्वार्थों
के हाथों
कभी न आत्मसमर्पण हो ! …………स्वाभिमान की कीमत पर तो बिल्कुल नही………बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 22 दिसंबर 2011 को 10:17 am  

सच के लिए
लड़ाई में
निजी स्वार्थों
के हाथों
कभी न आत्मसमर्पण हो !

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति ...
सादर

Pallavi 22 दिसंबर 2011 को 2:02 pm  

बहुत हे सुंदर भावाव्यक्ति समय मिले कभी तो ज़रूर आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
http://aapki-pasand.blogspot.com/2011/12/blog-post_21.html

sushila 22 दिसंबर 2011 को 2:39 pm  

"कोई दुराव-छिपाव नहीं
व्यवहारगत सच्चाईयां
मन प्राण का दर्पण हो !"

यदि सच्चाई का दामन थाम लिया जाये तो जीवन बहुत सरल और सुंदर हो जाये ! सुंदर भाव हैं !

सदा 23 दिसंबर 2011 को 7:14 am  

सच के लिए
लड़ाई में
निजी स्वार्थों
के हाथों
कभी न आत्मसमर्पण हो !
वाह ...बहुत ही बढिया।

प्रतिभा सक्सेना 23 दिसंबर 2011 को 1:21 pm  

कितनी सुन्दर कामना - जिसकी पूर्णता में सब का कल्याण निहित है !
हम भी आपके साथ है !

Rakesh Kumar 29 दिसंबर 2011 को 3:35 am  

सच के लिए
लड़ाई में
निजी स्वार्थों
के हाथों
कभी न आत्मसमर्पण हो !

बहुत सुन्दर.
संगीताजी की हलचल से आपकी इस पोस्ट पर आना बहुत ही सुखद लगा.

मेरी पोस्ट 'हनुमान लीला भाग-२' आपका इंतजार करती है,अनुपमा जी.

दिलीप 5 जनवरी 2012 को 3:26 pm  

kya bhaav hain bahut sundar

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