अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

धागे की महिमा!

"स्वप्न से स्मृति तक" पर कृष्ण प्रेम और ललित प्रेम शीर्षक कविता पढ़ना ऐसा था जैसे अपने भीतर से ही बहुत कुछ ढूंढ निकालने की यात्रा पर चल देना...
'कृष्ण प्रेम था ललित बहुत
पर ललित प्रेम है कृष्ण नहीं'
कविता की इन पंक्तियों पर मन अटक कर रह जाता... और इस भिन्नता में अभिन्नता तलाशने में सकल भाव जुट जाते... हृदय से खोजो तो क्या नहीं मिलता... अपने आप को निरुत्तर करने के लिए लिखी थी यह कविता... और बहुत ख़ुशी हुई थी लिख कर... आज २१/१२/२०११ को इस पोस्ट को पुनः पोस्ट कर रहे हैं कुछ बदल कर... पहले इसे अधूरा पोस्ट किया था क्यूंकि ये समझ नहीं आ रहा था कि सन्दर्भ कैसे दें... आज सन्दर्भ की जैसे कोई आवश्यक ही नहीं... सब कुछ स्पष्ट जो है...! अनुशील पर आपकी कविता का जवाब तलाशने का नन्हा प्रयास...

क्यूंकि
वो हर जगह नहीं हो सकते थे
इसलिए
उन्होंने माँ बनाई!
और माँ भी नहीं हो सकती थी
हर गम की साझेदार,
इसलिए
दुनिया में अवतरित हुए भाई!!

जिनके सानिध्य में
पीड़ा खो सके...
जिनके कंधे पर सर रख
बहने बेफिक्र हो सो सके...
जब गढ़ रहा था वो रिश्ते,
तब कितने ही सांचे टूटे
फिर जाकर
इस रिश्ते की गरिमा प्रकाश में आई!!

स्नेहसूत्र की परिभाषा में
आबद्ध सकल संसार है
धागे से बंधा
ये अदृश्य प्यार है
सब हार गए...
भरी सभा में द्रुपद सुता का कोई न हुआ सहाई
तब उसने
मधुसूदन को ही थी आवाज़ लगायी!!

एक धागे के बदले में
प्रभु ने दिव्य वसन वार दिए
भीष्म की कुलवधू के
डूबते प्राण तार दिए
शान्ति की स्थापना कर दे...
भले कैसी भी छिड़ी हो लड़ाई
सच!
कितना सर्व समर्थ था वो कन्हाई!!

जब इस युग की विडंबना से
प्रभु बेचैन हुआ
इस जग में व्याप्त बेगानेपन से
सिक्त उसका नयन हुआ
तब उसने एक ललित छवि बनाई
जहान भर की संवेदना डाली उसमें
और हृदय में
खुद अपनी जगह सजाई!!

अब वो परमेश्वर
वहीं भावों में बहता है
मंदिर से विदा हो चुका,
अब कन्हैया
स्वयं ललित हृदय में रहता है
सारे जहान का दर्द
उसने दामन में समेट रखा है...
उसके लिए हम भी सगे हैं
कोई बात नहीं पराई
कृष्ण ललित है... फिर ललित कृष्ण क्यूँ नहीं...?
ये तो मीरा वाली भक्ति है!
अरे!
ये ललित ही है कन्हाई!!!

आज कविता को पुनः यहाँ लिखते हुए आपकी एक और कविता की चार पंक्तियाँ भी उद्धृत कर दें....

"सारा जहां मेरा होगा अब
संग मेरे जग गायेगा
हर छोटा-सा कण भी मेरे
साथ शिखर तक जाएगा"

कृष्णमयी शक्ति के अभाव में यह कैसे लिखते आप... इसलिए सार यही है... कि उत्तर तक पहुँचने में हम कहीं भटके नहीं... ठीक मंजिल पर पहुंचे हैं... और शायद कुछ अन्य प्रश्न भी हल हो गए इस पूरी प्रक्रिया में... इश्वर की सत्ता पर सवाल करने वाले बस अपने भीतर झाँक कर देख लें... प्रभु वहीँ मुस्कुराते हुए मिलेंगे, यह भी नहीं करना है तो आस पास ही देखें..., जहाँ इंसान नज़र आये समझो वहीँ प्रभु के दर्शन हो गए... जहाँ ज़िन्दगी तमाम विरोधाभासों के बावजूद मुस्कुरा रही हो वहां प्रभु नहीं तो और क्या है...!!!
बात कहाँ से शुरू हो कर कहाँ जा रही है... खैर, डरते डरते संकोचवश बहुत कुछ नहीं कह पाते हैं... सोचा आज कह लें प्रवाह में... सो, कह लिया! आपके लिए लिखी गयी कविता है सो आपको तो पढ़नी ही पड़ेगी...:)
इन ढ़ेर सारे भावों से सरोकार न रखने वाला भी कोई अगर इसे पढ़े तो कुछ सत्य उभरेंगे ज़रूर..., वैसे यहाँ कविता जैसा तो कुछ है नहीं... बस भाव हैं, आंसू हैं और ईश्वर से की गयी बालसुलभ सी जिद है...
स्नेहाधीन को ढ़ेर सारा स्नेह!!!

3 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) 13 अगस्त 2010 को 7:43 am  

खूबसूरत अभिव्यक्ति ...सटीक

sunita 18 सितंबर 2010 को 11:52 am  

सुन्दर भावनाओं से सजी रचना

Dr. Ernest Albert 18 सितंबर 2010 को 2:59 pm  

achhi lagi aapki ye kavita,
sach mein!
dhanyawaad.

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